| عشق تا مایلِ بیان گردید | دو جهان شوخیِ زبان گردید | |
| آمد و بر درِ شنیدن زد | خامشی رفت و داستان گردید | |
| آفتابِ ازل نقاب گشود | ذرّه ناچار پَرفِشان گردید | |
| ظاهر و باطنی به حرف آمد | اعتبارات جسم و جان گردید | |
| مژهی شوق، باز کرد آغوش | وسعتآیینهی جهان گردید | |
| سَرِ سوداییئی به گردش رفت | عرضِ دورانِ آسمان گردید | |
| حرص در طبعِ آب و خاک افسرد | گوهر و لعلِ بحر و کان گردید | |
| اعتباراتِ پوچ توفان کرد | محملِ موج و کف روان گردید | |
| تخم بشکست و ریشه صورت بست | ریشه بالید و گلسِتان گردید | |
| دشتِ امکان نداشت دَیّاری | گَردِ اوهام، کاروان گردید | |
| ریشه برعکس میدود اینجا | نفس از عاجزی فغان گردید | |
| تا نوای فنا عیان گردد | زندگی سازِ امتحان گردید | |
| عمر گل کرد و داغِ فرصت برد | شرری پَر زد و نهان گردید | |
| بیقرارانِ شوق را چون صبح | بالِ پرواز، آشیان گردید | |
| خونِ شوقی بر آستانِ نیاز | خاک گشت و چمن عیان گردید | |
| شوقِ دیدار شد دلیلِ طلب | اشک پیش از نگه روان گردید | |
| ناله بالید در هوای قدی | سروِ گلزار بینشان گردید | |
| اشک هم در قفای بیتابی | رفت جایی که دل توان گردید | |
| نه خزان جلوهگر شد و نه بهار | اینقدَر رنگ بلبلان گردید | |
| غیرِ این معنی آشکار نشد: | - تا یقین فارغ از گمان گردید – | |
| که جهان نیست جز تجلّیِ دوست | ||
| این من و ما، همان اضافَتِ اوست | ||