| ای همه جسم، اندکی جان باش |
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سخت افسردهای پَرافشان باش |
| حرفِ درد، آشیانِ موزونیست |
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ناله شو، ذکرِ عندلیبان باش |
| گو به فریادِ ما کسی نرسد |
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زندگی بیکسیست، نالان باش |
| دعویِ عشق کردهای! خون شو |
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گنج، بیرنج نیست، ویران باش |
| بیفنا، سیرِ عیش نتوان کرد |
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در خود آتش زن و چراغان باش |
| نیستی، ختمِ نشئهی هستیست |
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هرچه باشی، به خاک، یکسان باش |
| هرزهتازِ نگاه، نتوان زیست |
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گر توان چشم گشت، حیران باش |
| شهرتت بادِ آفتی دارد |
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گر چراغی، به زیرِ دامان باش |
| هردوعالم تویی چو نیست شوی؛ |
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ای همه آشکار! پنهان باش |
| نوبهارت حضورِ بیرنگیست |
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رنگها بشکن و گلستان باش |
| معنیِ مشربِ فنا دریاب |
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حیرتِ کافر و مسلمان باش |
| رشتهی سازِ شوق، بیگره است |
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نالهای فارغ از نیستان باش |
| عجزِ ظاهر، شکوهِ باطنِ توست |
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در دلِ مور، خود سلیمان باش |
| تو دلی جمع کن به ضبطِ نَفَس |
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گو غبارِ جهان پریشان باش |
| غنچهها جامه میدرند امروز |
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کای ز دل بیخبر! گریبان باش |
| کسوتِ شرم، غیرِ هستی نیست |
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چشمی از خود بپوش، عریان باش |
| همه تحصیلِ حاصل است اینجا |
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طالب آنچه یافت نتوان باش |
| شرم دار از گرانبهاییِ خویش |
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هرقَدَر میخرند، ارزان باش |
| ذاتی ای بیخبر! صفات کجاست؟ |
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موج و کف گفتوگوست، عَمان باش |
| تا بهارت غمِ خزان نکِشَد |
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اینقدَر یادگیر و نازان باش |