| آه از دامِ عشق رَم کردیم |
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خویش را غافل از عدم کردیم |
| دل که شمعِ حریمِ وحدت بود |
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داغِ بتخانه و حرم کردیم |
| خطِ زخمی نشد نصیبِ جگر |
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نسخههای هوس رقم کردیم |
| داغِ عشقی به سینه میبایست |
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بیخبر کیسه پر دِرَم کردیم |
| زینتِ ما به اشکِ گلگون بود |
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سرخیِ طلعت از بَقَم کردیم |
| ننوشتیم نقطهی اشکی |
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مژهها را عبث قلم کردیم |
| طلب از خویش رفتنی میخواست |
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تکیه بر طاقتِ قَدَم کردیم |
| خامشی داشت نغمهی تحقیق |
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تا نفس وقفِ زیر و بم کردیم |
| مدعا بود آهِ دردآلود |
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خواهشِ پرچم و علم کردیم |
| مدتِ وصل، در فراغ گذشت |
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شهد، در کامِ خویش، سم کردیم |
| نغمه بیپرده بود و جلوه عیان |
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چشم بستیم و گوش اصم کردیم |
| مطلق از جهلِ ما مقید شد |
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بر صمد، تهمتِ صنم کردیم |
| عمر گردید صرفِ بیدردی |
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غم فزودیم و ناله کم کردیم |
| پیر گشتیم و طاقت از کف رفت |
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پیکری بیسجود، خم کردیم |
| نکتهای گفت دوش دانایی |
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که: شنیدن به ناله ضم کردیم |
| یعنی آیینه شد یقین کز جهل |
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هرچه کردیم ما ستم کردیم |
| فرصتِ گریه رفته بود از دست |
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دیده دریا و اشک، یم کردیم |
| داغِ عمرِ گذشته در غفلت |
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تازه از شعلههای غم کردیم |
| باری از دردِ یأس و شوق امید |
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شاد گشتیم و گریه هم کردیم |
| آخر آن لفظ معنی حیرت |
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تا تو باور کنی رقم کردیم |