| اعتبارِ حقیقتِ ازلیم |
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آب و رنگِ بهارِ لَمیَزَلیم |
| عشق، هرجا به خون تپَد، بالیم |
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حسن، هرجا چمن شود، حُلَلیم |
| شوقِ ما داشت جلوهها در کار |
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عِلم بودیم، این زمان عَمَلیم |
| بهرِ ترتیبِ نظمِ امکانی |
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چون ردیف و قوافیِ غَزَلیم |
| عمر، سررشتهی توجهِ ماست |
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گر تغافل ز خود کنیم اَجَلیم |
| چشم یک چند دامِ جلوهگریست |
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شیشه گر بشکند پری مَثَلیم |
| مستی از پهلویِ دل است اینجا |
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صد خرابات شیشه در بَغَلیم |
| چون سحر از غبارِ وهمِ نَفَس |
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بسکه بر خویش چیدهایم، تَلیم |
| تا دِماغِ هوس رسا گردد |
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گوهرآرای رشتهی اَمَلیم |
| کارِ ما زین بساط مفتبریست |
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بازی رنگِ وهم را شَتَلیم |
| صلح، درس کتاب وحدت بود |
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تا طَرْف آشکار شد جَدَلیم |
| زهر میپرورد تمیزِ صفات |
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ورنه بالذّات چشمهی عَسَلیم |
| مدعا هیچ و این همه نیرنگ |
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عرضِ اوهام و اینقدَر حیَلیم |
| وهمِ کثرت نمای یکتاییست |
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معنیِ واحدیم و مبتَذَلیم |
| سازِ ما قابلِ اقامت نیست |
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نالهای در توهّمِ جَبَلیم |
| هستی اکنون به جای نیستی است |
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عدمی رفته است و ما بَدَلیم |
| خجلتِ اعتبار اگر این است |
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هرقدر ظاهریم، بیمَحَلیم |
| خواه افسانه گیر و خواه خیال |
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هرچه هستیم از همین قبَلیم |
| گر کنی فهمِ گیر و دار ظهور |
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چون نفسْ جَهَد، هیچْ ماحَصَلیم |
| (گر) با همه اعتبار، ساز شکست |
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به همین نکته ایمن از خلَلیم |